भारत-ईयू एफटीए के बाद ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ पर बैठक: जयशंकर अगले हफ्ते वॉशिंगटन जाएंगे
भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के बाद वैश्विक सप्लाई-चेन और रणनीतिक संसाधनों पर फोकस तेज हुआ है। इसी कड़ी में विदेश मंत्री एस. जयशंकर अगले हफ्ते वॉशिंगटन डीसी जाकर ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ पर होने वाली उच्चस्तरीय बैठक में भाग लेंगे।
नई दिल्ली/वॉशिंगटन: भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर बनी नई स्थिति के बीच, वैश्विक रणनीतिक साझेदारी और सप्लाई-चेन सुरक्षा का विषय फिर केंद्र में आ गया है। ताजा अपडेट के अनुसार, विदेश मंत्री एस. जयशंकर अगले हफ्ते वॉशिंगटन डीसी की यात्रा पर जाएंगे, जहां वे ‘क्रिटिकल मिनरल्स’ पर आयोजित एक हाई-लेवल बैठक में हिस्सा लेंगे।

4 फरवरी को अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट में बैठक
रिपोर्ट के मुताबिक यह बैठक 4 फरवरी को अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट में होने वाली है और इसे क्रिटिकल मिनरल्स पर पहली मंत्री-स्तरीय बैठक बताया गया है। ऐसे समय में, जब इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरियों, सेमीकंडक्टर, रक्षा और उन्नत विनिर्माण के लिए आवश्यक खनिजों को लेकर देशों की प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है, यह चर्चा वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी अहम मानी जा रही है।
क्रिटिकल मिनरल्स क्यों हैं ‘रणनीतिक’
क्रिटिकल मिनरल्स (जैसे लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, रेयर अर्थ एलिमेंट्स आदि) आधुनिक टेक्नोलॉजी और ऊर्जा संक्रमण की रीढ़ माने जाते हैं। इनकी सप्लाई अक्सर सीमित भौगोलिक क्षेत्रों और कुछ प्रमुख उत्पादक देशों पर निर्भर रहती है। इसी वजह से कई देश इन संसाधनों की सुरक्षित आपूर्ति, विविधीकरण, रीसाइक्लिंग, और वैकल्पिक स्रोत विकसित करने को रणनीतिक प्राथमिकता बना चुके हैं।
भारत के लिए क्या मायने
भारत के लिए क्रिटिकल मिनरल्स पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग का मतलब केवल कच्चे माल तक पहुंच नहीं है, बल्कि मूल्य-श्रृंखला में ऊपर चढ़ना भी है—यानी प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग, बैटरी-निर्माण, और हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग को घरेलू स्तर पर मजबूत करना। साथ ही, साझेदार देशों के साथ पारदर्शी नियम, निवेश सुरक्षा, और दीर्घकालिक सप्लाई अनुबंधों पर सहमति भारत की औद्योगिक योजनाओं के लिए मददगार हो सकती है।
एफटीए के बाद कूटनीतिक गति
भारत-ईयू एफटीए की पृष्ठभूमि में यह यात्रा इस बात का संकेत भी देती है कि व्यापार समझौतों के साथ-साथ रणनीतिक सामग्री और तकनीकी साझेदारी पर बातचीत को समानांतर रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। वैश्विक मंच पर यह संदेश भी जाता है कि भारत ऊर्जा संक्रमण और उभरती तकनीक के क्षेत्र में सप्लाई-चेन लचीलापन बढ़ाने के लिए सक्रिय कूटनीति कर रहा है।
- बैटरी और ईवी इकोसिस्टम के लिए खनिज आपूर्ति को स्थिर करना
- सेमीकंडक्टर, रक्षा और उन्नत निर्माण के लिए दीर्घकालिक रणनीति
- सप्लाई-चेन में विविधीकरण और भरोसेमंद साझेदारों के साथ सहयोग
- प्रौद्योगिकी, निवेश और मानकों पर तालमेल
आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि वॉशिंगटन में होने वाली बातचीत के बाद किन क्षेत्रों में नए संयुक्त कदम, निवेश प्रस्ताव या ढांचागत सहमति सामने आती है।