भारत-EU ट्रेड डील पर अमेरिका की सख्त प्रतिक्रिया, यूरोप को ‘रूस वॉर फंडिंग’ वाली टिप्पणी से घेरा
भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच ट्रेड डील/FTA को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी हलचल दिखी। अमेरिकी पक्ष से आई टिप्पणी में यूरोप पर ‘अपने ही खिलाफ’ कदम उठाने जैसे आरोप लगाए गए और रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में बयानबाजी तेज हुई।
27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर माहौल सिर्फ आर्थिक नहीं रहा—यह वैश्विक राजनीति का मुद्दा भी बन गया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार अमेरिका की ओर से इस डील पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई। बयान में यह संकेत दिया गया कि यूरोप अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में विरोधाभास पैदा कर रहा है और रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में ‘वॉर फंडिंग’ जैसी तीखी भाषा इस्तेमाल की गई।

खबरों के मुताबिक टिप्पणी ऐसे वक्त आई जब भारत और EU लंबे समय से लंबित बातचीत को पूरा करते हुए औपचारिक घोषणा/मुहर की तरफ बढ़ रहे थे। अमेरिका में टैरिफ और व्यापार-नीति से जुड़े तनाव के बीच यह बयान बताता है कि बड़े व्यापार समझौते अब केवल टैरिफ घटाने या बाजार खोलने तक सीमित नहीं हैं—वे गठबंधनों, ऊर्जा-आपूर्ति, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक भरोसे से भी जुड़े हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत-EU समझौता यूरोप के लिए सप्लाई-चेन विविधीकरण और बाजार विस्तार का जरिया हो सकता है, जबकि भारत के लिए यह निर्यात, निवेश और मानक-आधारित बाजार तक पहुंच बढ़ाने का अवसर बन सकता है। इसी वजह से अन्य शक्तियों की प्रतिक्रियाएं—खासतौर पर अमेरिका की—सिर्फ आर्थिक प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि प्रभाव-क्षेत्र की राजनीति भी दर्शाती हैं।
आने वाले हफ्तों में यह देखना अहम होगा कि इस तरह की बयानबाजी भारत-EU डील की शर्तों या समयसीमा को कितना प्रभावित करती है। साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण रहेगा कि यूरोप अपने रक्षा और ऊर्जा-संबंधी फैसलों के साथ व्यापार-रणनीति को कैसे संतुलित करता है और अमेरिका किस स्तर तक इसे कूटनीतिक या आर्थिक दबाव के रूप में आगे बढ़ाता है।