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ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते पर सहमति, फ्रांस समेत यूरोप भर के किसानों का विरोध तेज

यूरोपीय संघ ने मर्कोसुर देशों के साथ लंबे समय से अटके व्यापार समझौते को आगे बढ़ाया है। समर्थकों के मुताबिक यह निर्यात बढ़ाने और शुल्क बचत के जरिए यूरोपीय अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता है, जबकि फ्रांस, पोलैंड जैसे देशों के किसान इसे घरेलू कृषि पर दबाव बढ़ाने वाला कदम मानकर सड़कों पर हैं।

समझौता क्या है और किन देशों से जुड़ा है

यूरोपीय संघ और दक्षिण अमेरिकी समूह ‘मर्कोसुर’ के बीच व्यापार समझौते पर सहमति बनी है। मर्कोसुर में अर्जेंटीना, ब्राजील, पराग्वे और उरुग्वे जैसे देश शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यूरोपीय संघ के अधिकांश सदस्य देशों ने इस समझौते का समर्थन किया और इसे 25 साल से अटके बड़े करार के रूप में देखा जा रहा है।

ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते पर सहमति, फ्रांस समेत यूरोप भर के किसानों का विरोध तेज
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समर्थक पक्ष का तर्क है कि यह समझौता निर्यात को बढ़ावा दे सकता है, सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को सहारा दे सकता है और वैश्विक अनिश्चितता के समय में लैटिन अमेरिकी साझेदारों के साथ संबंध मजबूत कर सकता है।

किसान क्यों नाराज हैं

फ्रांस और पोलैंड समेत कई देशों में किसानों ने समझौते का विरोध किया है। किसानों की चिंता यह है कि दक्षिण अमेरिका से कृषि उत्पादों के आयात से प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और घरेलू कृषि क्षेत्र पर कीमतों तथा मानकों का दबाव पड़ेगा। इसी कारण फ्रांस सहित कई जगहों पर प्रदर्शन हुए और यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंचा।

रिपोर्ट में बताया गया कि विरोध के बावजूद बहुमत समर्थन के कारण प्रक्रिया आगे बढ़ी। कुछ देश विरोध में रहे, लेकिन अंततः समझौते को रोकने लायक संख्या नहीं जुट पाई।

अर्थव्यवस्था और रणनीति पर संभावित असर

ईयू का कहना है कि इस समझौते से यूरोपीय कंपनियां हर साल अरबों यूरो के शुल्क बचा सकती हैं और लैटिन अमेरिकी बाजारों में वाहन, मशीनरी, वाइन और अन्य उत्पादों के निर्यात में सुविधा होगी। विश्लेषकों के अनुसार यह करार ‘रेयर अर्थ’ जैसी रणनीतिक आपूर्ति के मामले में यूरोप की निर्भरता घटाने की दिशा में भी मदद कर सकता है।

हालांकि, कृषि हितों और व्यापार उदारीकरण के बीच यह टकराव आने वाले महीनों में यूरोप की घरेलू राजनीति में बना रह सकता है। कई किसान संगठनों के लिए यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि आजीविका और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सवाल है।

रिपोर्टिंग रिकॉर्ड

स्रोत

  1. Deutsche Welle (DW हिन्दी)Deutsche Welle (DW हिन्दी)