भारत में मोटापे को ‘पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी’ मानकर राष्ट्रीय रणनीति की जरूरत: डॉक्टर की राय
एक हेल्थ रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है और इसे 2026 में गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में देखना चाहिए। रिपोर्ट में NFHS-5 के आंकड़ों का हवाला देते हुए और हाल के शोधों का जिक्र करते हुए वजन बढ़ने, पेट की चर्बी और उससे जुड़ी बीमारियों पर राष्ट्रीय स्तर की रणनीति की जरूरत बताई गई है।
भारत में बढ़ते मोटापे को लेकर एक हेल्थ रिपोर्ट ने चेताया है कि यह अब केवल व्यक्तिगत जीवनशैली की समस्या नहीं रह गई, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य (public health) की बड़ी चुनौती बनती जा रही है। रिपोर्ट में डॉक्टर की राय के आधार पर यह तर्क दिया गया है कि 2026 में मोटापे के बढ़ते बोझ को देखते हुए एक राष्ट्रीय स्तर की ‘ओबेसिटी स्ट्रैटेजी’ की जरूरत है—जिसमें रोकथाम, स्क्रीनिंग, पोषण शिक्षा और दीर्घकालिक हस्तक्षेप शामिल हों।

आंकड़े क्या संकेत देते हैं
रिपोर्ट में NFHS-5 (2019-21) जैसे सर्वे का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि वयस्कों में ओवरवेट/ओबेसिटी का अनुपात कई राज्यों में तेजी से बढ़ा है। यह समस्या केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं रही; ग्रामीण क्षेत्रों में भी जीवनशैली और खानपान में बदलाव के कारण जोखिम बढ़ता दिख रहा है।
क्यों बढ़ रहा है जोखिम: भोजन, गतिविधि और दिनचर्या
डॉक्टर की व्याख्या के अनुसार, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन, मीठे पेय, अनियमित दिनचर्या, कम शारीरिक गतिविधि, और तनाव/नींद की कमी जैसे कारक वजन बढ़ने में योगदान दे रहे हैं। समस्या यह भी है कि मोटापा अक्सर धीरे-धीरे बढ़ता है और लोग तब तक गंभीरता से नहीं लेते, जब तक शुगर, हाई BP, फैटी लिवर या हृदय रोग जैसी जटिलताएं सामने न आ जाएं।
राष्ट्रीय रणनीति में क्या शामिल हो सकता है
- स्कूल-स्तर पर पोषण शिक्षा और नियमित शारीरिक गतिविधि का ढांचा
- प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में BMI/कमर-नाप की नियमित स्क्रीनिंग
- खाद्य लेबलिंग, ट्रांस-फैट और चीनी खपत पर प्रभावी नीतियां
- हाई-रिस्क लोगों के लिए काउंसलिंग और फॉलो-अप प्रोग्राम
- कार्यस्थलों और शहरी योजना में ‘एक्टिव लिविंग’ को प्रोत्साहन
अगला कदम: जागरूकता से आगे ‘सिस्टम’ बनाना
रिपोर्ट का निष्कर्ष यह है कि केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं हैं। मोटापे के खिलाफ प्रभावी लड़ाई के लिए स्वास्थ्य तंत्र, स्कूल, खाद्य उद्योग और स्थानीय प्रशासन—सभी स्तरों पर एक संगठित और लगातार चलने वाली रणनीति जरूरी है, ताकि जोखिम को शुरुआती चरण में ही कम किया जा सके और दीर्घकालिक बीमारियों का बोझ घटे।