फेक न्यूज के खिलाफ ‘डिजिटल वॉर’: ऑपरेशन सिंदूर के अनुभव के बाद भारतीय सेना AI-आधारित सिस्टम तैयार कर रही
नवभारत टाइम्स के अनुसार ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फेक न्यूज और दुष्प्रचार से निपटने में सेना को काफी संसाधन लगाने पड़े। अब इस चुनौती के जवाब में सेना IISc बेंगलुरु के साथ मिलकर स्वदेशी AI-आधारित सिस्टम पर काम कर रही है, ताकि सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फैलने वाली गलत सूचनाओं को रियल-टाइम में पहचानकर उन्हें काउंटर किया जा सके।
दुष्प्रचार क्यों बना ऑपरेशनल चुनौती
डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फेक न्यूज और भ्रामक दावों की रफ्तार तेज होने से सुरक्षा एजेंसियों के सामने ‘सूचना युद्ध’ की नई चुनौती खड़ी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान गलत और तोड़-मरोड़ कर फैलाई गई सूचनाओं ने संसाधन और समय दोनों पर दबाव बढ़ाया। ऐसे हालात में वास्तविक जानकारी को तेजी से पहचानना और जनता तक सही तथ्य पहुंचाना ऑपरेशनल जरूरत बन जाता है।

युद्ध या सुरक्षा अभियानों के समय अफवाहें सिर्फ भ्रम नहीं फैलातीं, बल्कि जोखिम भी बढ़ाती हैं—कभी संवेदनशील लोकेशन को लेकर गलत दावे, कभी फर्जी वीडियो, तो कभी किसी घटना की समय-रेखा को बदलकर पेश करना। इसी वजह से सेना अब तकनीक-आधारित समाधान को अधिक गंभीरता से अपना रही है।
IISc के साथ स्वदेशी AI सिस्टम: लक्ष्य क्या है
नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सेना IISc बेंगलुरु के सहयोग से एक स्वदेशी AI-आधारित सिस्टम विकसित कर रही है। उद्देश्य यह बताया गया है कि सोशल मीडिया व अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चल रही फेक न्यूज को तेजी से पकड़ा जा सके और उसके प्रभाव को कम करने के लिए त्वरित काउंटर-एक्शन संभव हो।
AI आधारित ऐसे टूल्स आम तौर पर कंटेंट पैटर्न, सोर्स नेटवर्क, वायरलिटी सिग्नल और मल्टीमीडिया संकेतों (जैसे एडिटेड वीडियो/डीपफेक) को देखकर जोखिम का आकलन कर सकते हैं। इस तरह की व्यवस्था का फायदा यह है कि वह केवल मैनुअल मॉनिटरिंग पर निर्भर नहीं रहती और बड़े डेटा-फ्लो में भी प्राथमिकता तय करने में मदद करती है।