ईयू-मर्कोसुर व्यापार समझौते को हरी झंडी, फ्रांस समेत कई देशों के किसान नाराज़
यूरोपीय संघ ने दक्षिण अमेरिकी समूह मर्कोसुर के साथ लंबे समय से अटके बड़े व्यापार समझौते को मंजूरी दी. समर्थक इसे शुल्क बचत और निर्यात अवसरों से जोड़ रहे हैं, जबकि फ्रांस समेत कई जगह किसानों और ट्रेड यूनियनों ने विरोध जताया है.
यूरोपीय संघ (ईयू) ने दक्षिण अमेरिकी देशों के समूह मर्कोसुर के साथ लंबे समय से लंबित व्यापार समझौते को मंजूरी दे दी है. रिपोर्ट के मुताबिक यह डील लगभग 25 साल से अटकी हुई थी और अब ब्रसेल्स में राजदूतों की बैठक के बाद ईयू के अधिकांश सदस्य देशों ने इसके समर्थन में कदम बढ़ाया.

मर्कोसुर लैटिन अमेरिकी अर्थव्यवस्थाओं का एक समूह है, जिसमें अर्जेंटीना, ब्राज़ील, पराग्वे और उरुग्वे शामिल हैं. इस समझौते को समर्थक पक्ष यूरोपीय कंपनियों के लिए शुल्क में बचत और लैटिन अमेरिकी बाजारों तक बेहतर पहुंच के रूप में देख रहे हैं.
ईयू के आकलन के अनुसार इस डील से यूरोपीय कंपनियां हर साल लगभग चार अरब यूरो के शुल्क बचा सकती हैं. इसके साथ ही वाहन, मशीनरी, वाइन और शराब जैसे यूरोपीय उत्पादों के निर्यात में सुविधा बढ़ने की उम्मीद जताई गई है.
दूसरी ओर, इस समझौते का सबसे तीखा विरोध कृषि क्षेत्र से सामने आया है. फ्रांस समेत कई हिस्सों में किसान और ट्रेड यूनियन सड़क पर उतरे और उनका कहना है कि आयात प्रतिस्पर्धा बढ़ने से स्थानीय किसानों पर दबाव बढ़ेगा. विरोध का एक बड़ा तर्क यह भी है कि कृषि मानकों, कीमतों और पर्यावरण/स्थिरता से जुड़ी शर्तों पर पर्याप्त सुरक्षा-प्रावधान जरूरी हैं.
रिपोर्ट में यह भी संकेत मिलता है कि राजनीतिक समीकरणों में बदलाव ने डील को आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई—उदाहरण के तौर पर कुछ देशों का अंततः समर्थन में आना, जिससे विरोध के बावजूद मंजूरी का रास्ता खुला.
आगे की चुनौती इस डील के कार्यान्वयन में ‘बैलेंस’ बनाने की होगी: व्यापार बढ़ाने के फायदे और घरेलू कृषि/ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले असर के बीच. ईयू के लिए यह समझौता रणनीतिक आपूर्ति शृंखलाओं, कच्चे माल और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक असंतोष का जोखिम साथ-साथ चल रहा है.